लेबनान में हज़ारों ईसाइयों ने ज़ायोनी सेना के आदेश के बावजूद गांव छोड़ने से इनकार कर दिया है जिसका पोप ने भी समर्थन किया है । दक्षिणी लेबनान में ज़ायोनी हमलों के बावजूद, ईसाई आबादी वाले गांवों के लगभग 10 हज़ार निवासियों ने तथाकथित “पीली रेखा” के भीतर स्थित अपने इलाकों को छोड़ने से इनकार कर दिया है। इन गांवों में दिब्ल, ऐन एबल और रमैश शामिल हैं, जहां अधिकांश आबादी मारोनी ईसाइयों की है।
ज़ायोनी सैन्य कार्रवाइयों के बावजूद ये लोग अपने घरों में डटे हुए हैं। ज़ायोनी हमलों में अब तक कम से कम 2759 लोग मारे जा चुके हैं, जबकि 8512 लोग घायल हुए हैं और 16 लाख से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। हालांकि इन गांवों में हिज़्बुल्लाह की कोई गतिविधि दिखाई नहीं देती, जिस कारण वे सीधे बमबारी से कुछ हद तक सुरक्षित रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद वहां रहने वाले लेबनानी नागरिक युद्ध और अप्रैल में घोषित युद्ध-विराम के दौरान भी गंभीर मानवीय कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। इसके बाद पोप लियो ने मंगलवार को दक्षिणी लेबनान के पादरियों के साथ वीडियो कॉल पर बातचीत की, उनकी दृढ़ता और साहस की प्रशंसा की तथा उन्हें अपनी दुआओं और आशीर्वाद से नवाज़ा।
रमैश के पादरी फादर नाजिब अल-आमिल के अनुसार, पोप ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह उनके लिए प्रार्थना कर रहे हैं और उनसे पूरी दुनिया में शांति के लिए दुआ करने की अपील की। पोप के इस कदम से वहां की ईसाई समुदाय का मनोबल काफी बढ़ा है। बताया जाता है कि तीन सप्ताह तक ये गांव पूरी तरह दुनिया से कटे रहे, जहां न कोई अंदर जा सका और न कोई बाहर निकल सका।
17 अप्रैल को घोषित युद्ध-विराम के बाद पहली बार राहत सामग्री के काफिले वहां पहुंचे, लेकिन अब भी कोई सुरक्षित रास्ता उपलब्ध नहीं है। रमैश में कैंसर और गुर्दे के मरीजों को दवाओं की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है, जबकि सबसे नज़दीकी अस्पताल 70 किलोमीटर दूर सैदा (सैदोन) शहर में स्थित है। ज़ायोनी सेना ने अपने हमलों के दौरान ईसाई धार्मिक प्रतीकों को भी निशाना बनाया।
दिब्ल में ज़ायोनी सैनिकों ने मदर मैरी (हज़रत मरयम) की प्रतिमा का अपमान करते हुए उसके मुंह में सिगरेट रख दी। इससे पहले 19 अप्रैल को एक ज़ायोनी सैनिक का हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की प्रतिमा तोड़ते हुए वीडियो भी वायरल हुआ था, जिसकी वैश्विक स्तर पर निंदा की गई।
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